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विद्या भारती

एक परिचय

विद्या भारती का कार्य राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की प्रेरणा से शिक्षा क्षेत्र में विद्यालय तथा उच्‍च शिक्षण संस्‍थायें चलाना है। इन शिक्षण संस्‍थाओं के माध्‍यम से बालकों को हिन्‍दुत्‍व निष्‍ठ एवं राष्‍ट्रभक्ति के संस्‍कार देते हुये एक अच्‍छे नागरिक निर्माण करने का कार्य विद्या भारती कर रही है, क्‍योंकि श्रेष्‍ठ एवं संस्‍कारित नागरिकों का निर्माण ही राष्‍ट्र निर्माण की गारण्‍टी है।

       विद्या भारती की कल्‍पना का शुभारम्‍भ राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कुछ कार्यकर्ताओं-जिनके जीवन का ध्‍येय बालकों को भारतीय संस्‍कृति के अनुरूप श्रेष्‍ठ संस्‍कारों के साथ-साथ श्रेष्‍ठ शिक्षा देना था, द्वारा 1952 में गोरखपुर में 5 रुपये प्रतिमाह किराये पर एक भवन में सरस्‍वती शिशु मंदिर की स्‍थापना से हुआ। इससे पूर्व 1946 में कुरूक्षेत्र में'गीता बाल विद्या मंदिर'की स्‍थापना हो चुकी थी, जिसका शिलान्‍यास राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के द्वारा किया गया था।

       श्रेष्‍ठ शिक्षा एवं संस्‍कारों के कारण इन सरस्‍वती शिशु मंदिरों को समाज में पहिचान एवं प्रसिद्धि मिलती चली गई, तथा कुछ ही वर्षों में उत्‍तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्‍थान, दिल्‍ली, मध्‍यप्रदेश, बिहार आदि राज्‍यों में ये विद्यालय प्रारम्‍भ होकर समाज में अपनी विशिष्‍ट पहिचान बनाते चले गये।

       राजस्‍थान में इन विद्यालयों का शुभारम्‍भ 1954 में जयपुर के राजापार्क में''आदर्श विद्या मंदिर''के नाम से हुआ। वर्तमान में राजस्‍थान में विद्या भारती की योजना से 991 विद्यालय चल रहे हैं, जिनका संचालन विद्या भारती की सम्‍बद्धता लिए 38 पंजीकृत समितियॉं कर रही हैं। ये विद्यालय पूर्व प्राथमिक स्‍तर से उच्‍च माध्‍यमिक स्‍तर के हैं, जिनमें 316905 बालक पढ़ रहे हैं तथा आचार्यों की संख्‍या 12602 है।

       राजस्‍थान में इन उपर्युक्‍त औपचारिक विद्यालयों के अतिरिक्‍त 471 संस्‍कार केन्‍द्र एवं मेवात क्षेत्र में तथा डूंगरपुर-बांसवाड़ा के वनाचंल एवं जन-जातीय क्षेत्र में 447 एकल शिक्षकीय विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं। इस प्रकार इन कुल 918 अनौपचारिक शिक्षण केन्‍द्रों में 23442 बालक पढ़ रहे हैं, तथा इन्‍हे 857 आचार्य शिक्षा एवं संस्‍कार देने में जुटे हुये हैं।

       इसी प्रकार देशभर में अपने इन विद्यालयों की लगभग 27000 संख्‍या है, जिनमें लगभग 34,50,069 लाख बालकों को 1,46,724 आचार्य संस्‍कार युक्‍त शिक्षा देने के कार्य में संलग्‍न हैं।

       अपने इन विद्यालयों में जीवन की प्रारंभिक शिक्षा एवं संस्‍कार प्राप्‍त कर समाज के विभिन्‍न क्षेत्रों में उसका प्रकटीकरण करते हुये अनेक पुरातन छात्र समाज सेवा में संलग्‍न है, जिन पर हमें गर्व है।

      

।। जय भारत ।।

 


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