All knowledge that the world has ever received comes from the mind; the infinite library of the universe is in your own mind. The external world is simply the suggestion, the occasion, which sets you to study your own mind, but the object of your study is always your own mind.
The child is the centre of all our aspirations. He is the protector of our country, Dharma (Religion) and culture. The development of our culture and civilization is implicit in the development of the child's personality. A child today holds the key for tomorrow. To relate the child with his land and his ancestors is the direct, clear and unambiguous mandate for education. We have to achieve the all round development of the child through education and sanskar i.e. inculcation of time honored values and traditions.
Indaia Believes in: ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ Meaning:- May all live happily. May all enjoy good health. May all see auspiciousness. May none experience distress. May peace prevail everywhere.
Dr. Keshav Rao Baliram Hedgewar's view about Education

Vidya Bharti Rajasthan

विद्या भारती

एक परिचय

 विद्या भारती का कार्य राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की प्रेरणा से शिक्षा क्षेत्र में विद्यालय तथा उच्‍च शिक्षण संस्‍थायें चलाना है। इन शिक्षण संस्‍थाओं के माध्‍यम से बालकों को हिन्‍दुत्‍व निष्‍ठा एवं राष्‍ट्रभक्ति के संस्‍कार देते हुये एक अच्‍छे नागरिक निर्माण करने का कार्य विद्या भारती कर रही है, क्‍योंकि श्रेष्‍ठ एवं संस्‍कारित नागरिकों का निर्मायण ही राष्‍ट्र निर्माण की गारण्‍टी है।

विद्या भारती की कल्‍पना का शुभारम्‍भ राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कुछ कार्यकर्ताओं-जिनके जीवन का ध्‍येय बालकों को भारतीय संस्‍कृति के अनुरूप श्रेष्‍ठ संस्‍कारों के साथ-साथ श्रेष्‍ठ शिक्षा देना था, द्वारा 1952 में गोरखपुर में 5 रुपये प्रतिमाह किराये पर एक भवन में सरस्‍वती शिशु मंदिर की स्‍थापना से हुआ। इससे पूर्व 1946 में कुरूक्षेत्र में 'गीता बाल विद्या मंदिर' की स्‍थापना हो चुकी थी, जिसका शिलान्‍यास राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के द्वारा किया गया था।

श्रेष्‍ठ शिक्षा एवं संस्‍कारों के कारण इन सरस्‍वती शिशु मंदिरों को समाज में पहिचान एवं प्रसिद्धि मिलती चली गई, तथा कुछ ही वर्षों में उत्‍तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्‍थान, दिल्‍ली, मध्‍यप्रदेश, बिहार आदि राज्‍यों में ये विद्यालय प्रारम्‍भ होकर समाज में अपनी विशिष्‍ट पहिचान बनाते चले गये।

 राजस्‍थान में इन विद्यालयों का शुभारम्‍भ 1954 में जयपुर के राजापार्क में ''आदर्श विद्या मंदिर'' के नाम से हुआ। वर्तमान में राजस्‍थान में विद्या भारती की योजना से 951 विद्यालय चल रहे हैं, जिनका संचालन विद्या भारती की सम्‍बद्धता लिए 38 पंजीकृत समितियॉं कर रही हैं। ये विद्यालय पूर्व प्राथमिक स्‍तर से उच्‍च माध्‍यमिक स्‍तर के हैं, जिनमें 2,84,204 बालक पढ़ रहे हैं तथा आचार्यों की संख्‍या 11,373 है।

 राजस्‍थान में इन उपर्युक्‍त औपचारिक विद्यालयों के अतिरिक्‍त 487 संस्‍कार केन्‍द्र एवं मेवात क्षेत्र में तथा डूंगरपुर-बांसवाड़ा के वनाचंल एवं जन-जातीय क्षेत्र में 413 एकल शिक्षकीय विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं। इस प्रकार इन कुल 861 अनौपचारिक शिक्षण केन्‍द्रों में 19681 बालक पढ़ रहे हैं, तथा इन्‍हे 847 आचार्य शिक्षा एवं संस्‍कार देने में जुटे हुये हैं।

 इसी प्रकार देशभर में अपने इन विद्यालयों की लगभग 27000 संख्‍या है, जिनमें लगभग 33 लाख बालकों को 1 लाख 27 हजार आचार्य संस्‍कार युक्‍त शिक्षा देने के कार्य में संलग्‍न हैं।

 अपने इन विद्यालयों में जीवन की प्रारंभिक शिक्षा एवं संस्‍कार प्राप्‍त कर समाज के विभिन्‍न क्षेत्रों में उसका प्रकटीकरण करते हुये इन विद्यालयों से समाज सेवा में संलग्‍न आप सब महानुभाव आज यहॉं एकत्र हैं, जिन पर हमें गर्व है।

  ।। जय भारत ।।

 


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सैकण्‍डरी - 2014 में मेरिट में आये भैया/बहिनों की सूची

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